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अनुसूचित जाति आयोग उत्तराखण्ड

भारत के संविधान के अधीन या तत्समय प्रवृत किसी अन्य विधि के अधीन राज्य सरकार के किसी आदेश के अधीन उत्तराखण्ड की अनुसूचित जातियों के लिए उपलब्धित रक्षोपायों से संम्बधित सभी मामलों के अन्वेशण और अनुश्रवण तथा ऐसे रक्षापायों की कार्यप्रणाली में मूल्यांकन के लिए उत्तराखण्ड सरकार द्वारा राज्य की विधान सभा से पारित उत्तरांचल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग अधिनियम 2003 के द्वारा 27 मई 2003 ई0 को उत्तरांचल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना की गई। उत्तराखण्ड अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग अधिनियम 2003 के अनुसार आयोग द्वारा अपनी प्रक्रिया एवं कार्य संचालन विनियमावली लागू की गई है। उत्तराखण्ड अनुसूचित आयोग ने संवैधानिक निकाय के रूप में अपने अस्तित्व के 19 वर्श से अधिक का समय पूर्ण कर लिया है। आयोग का कार्य क्षेत्र व्यापक है और उसमें अनुसूचित जाति के कल्याण और विकास से संम्बन्धित सुरक्षात्मक तथा समस्या निवारक दोनों के पक्ष सम्मिलित है। तथापि विभिन्न प्रतिबंधों के कारण आयोग ने अपनी गतिविधियों षिकायतों तक सीमित रखी,जिनमें से अधिकांषतया अत्याचार और सेवा सुरक्षणों को नकारने/उल्लंघन करने और विशयों से संबंधित थी। अनुसूचित जाति के अधिकारों का संरक्षण एवं विकास कार्यो में गति प्रदान किये जाने एवं अनुसूचित जाति अत्याचारों को कम करने एवं इस वर्ग की जनसमस्याओं का निराकरण तथा इनके कल्याणार्थ चलाये जा रहे विकास कार्यो के सफल क्रियान्वयन हेतु आयोग के मा0 अध्यक्ष, उपाध्यक्ष जनपद स्तर पर समीक्षा बैठकें कर सभी जनपद मुख्यालयों पर जनपदीय अधिकारियों के साथ बैठक कर विकास कार्यो में तेजी एवं समाज कल्याण विभाग द्वारा अनुसूचित जाति वर्ग हेतु चलायी जा रही कल्याणकारी योजनाओं का पूर्ण रूपेण क्रियान्वयन पर बल एवं प्रत्येक विकासखण्डों में अनुसूचित जाति बाहुल्य ग्रामों में विकासखण्ड के अनुसार गांव को आदर्ष ग्राम बनाने का सुझाव एवं एस0सी0एस0पी0 द्वारा चलाई जा रही विभागवार दी गई राषि को उसी वित्तीय वर्श में उपभोग करते हुए उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर बल दिया जाता रहा है।


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